नयी दिल्ली, 2 मार्च । उच्चतम न्यायालय ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) की मदद से कथित तौर पर तैयार किए गए काल्पनिक या अस्तित्वहीन न्यायिक निर्णयों पर भरोसा करने के मामले का संज्ञान लेते हुए कहा है कि ऐसे आधार पर फैसला देना मात्र त्रुटि नहीं, बल्कि कदाचार के समान होगा और इसके कानूनी परिणाम हो सकते हैं। शीर्ष अदालत ने इस मुद्दे को न्यायिक प्रक्रिया की शुचिता से जुड़ा गंभीर संस्थागत प्रश्न बताया है।
न्यायमूर्ति पी. एस. नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक आराधे की पीठ ने कहा कि अदालत इस विषय की व्यापक पड़ताल करेगी, ताकि जवाबदेही तय की जा सके और भविष्य के लिए स्पष्ट मानक स्थापित हों। पीठ ने आर वेंकटरमनी, तुषार मेहता तथा भारतीय विधिज्ञ परिषद को नोटिस जारी किए हैं। साथ ही, अदालत ने सहायता के लिए वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दीवान को नियुक्त किया है।
मामला उस समय शीर्ष अदालत के समक्ष आया जब वह आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय के जनवरी माह के एक आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई कर रही थी। रिकॉर्ड के अनुसार, एक निचली अदालत ने विवादित संपत्ति के संबंध में अधिवक्ता-आयुक्त की रिपोर्ट पर विचार करते हुए कुछ ऐसे निर्णयों का हवाला दिया था, जिनके बारे में याचिकाकर्ताओं ने दावा किया कि वे अस्तित्वहीन हैं और संभवतः एआई द्वारा तैयार किए गए हैं।
उच्च न्यायालय ने आपत्तियों पर विचार करते हुए कहा था कि संबंधित उद्धरण एआई-जनित प्रतीत होते हैं और सावधानी बरतने की आवश्यकता है, हालांकि उसने मामले के गुण-दोष के आधार पर निचली अदालत के निष्कर्ष को बरकरार रखा था। इसके बाद याचिकाकर्ताओं ने शीर्ष अदालत का दरवाजा खटखटाया।
शीर्ष अदालत ने अपने आदेश में कहा कि न्यायिक निर्णयों में संदर्भित प्राधिकारों की सत्यता सुनिश्चित करना न्यायिक प्रक्रिया की आधारभूत आवश्यकता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि “निराधार या फर्जी कथित निर्णयों” पर आधारित निष्कर्ष न्याय प्रशासन की विश्वसनीयता को प्रभावित करते हैं और इस प्रवृत्ति पर अंकुश आवश्यक है।
पीठ ने विशेष अनुमति याचिका पर सुनवाई के दौरान अंतरिम निर्देश देते हुए कहा कि अंतिम निर्णय तक निचली अदालत अधिवक्ता-आयुक्त की रिपोर्ट के आधार पर आगे की कार्यवाही न करे। मामले की अगली सुनवाई 10 मार्च को निर्धारित की गई है।
गौरतलब है कि हाल के महीनों में एआई उपकरणों के बढ़ते उपयोग को लेकर न्यायपालिका ने सावधानी बरतने पर जोर दिया है। शीर्ष अदालत ने पहले भी एआई-जनित सामग्री के सत्यापन के बिना न्यायिक अभिलेखों में उसके उपयोग पर चिंता जताई थी। विशेषज्ञों का मानना है कि यह प्रकरण न्यायिक तंत्र में प्रौद्योगिकी के जिम्मेदार उपयोग के लिए महत्वपूर्ण दिशानिर्देश तय कर सकता है।
