पंजाब के चुनावी प्रचार में धार्मिक मुद्दों से बचना होगा

पंजाब ने 1980 और 1990 के दशक में आतंकवाद, अलगाववाद और सांप्रदायिक तनाव का लंबा और दर्दनाक दौर देखा है, जिसकी भारी सामाजिक और आर्थिक कीमत राज्य को चुकानी पड़ी। वर्षों की मेहनत और आपसी विश्वास से प्रदेश में शांति और सामान्य स्थिति बहाल हुई है। ऐसे में चुनावी लाभ के लिए धार्मिक भावनाओं को भड़काना या अतीत की त्रासदियों को राजनीतिक मुद्दा बनाना राज्य के हित में नहीं है।

डॉ. अरुण मित्रा

जैसे-जैसे पंजाब में चुनावी माहौल बनता है, राजनीतिक विमर्श का केंद्र रोजगार, कृषि संकट, शिक्षा, स्वास्थ्य, निवेश और युवाओं के भविष्य जैसे मूलभूत मुद्दों पर होना चाहिए। लेकिन अक्सर चुनावों के समय ऐसी भावनात्मक और धार्मिक बहसों को हवा दी जाती है, जो समाज को विभाजित करती हैं और वास्तविक जनसमस्याओं से लोगों का ध्यान भटका देती हैं। पंजाब का इतिहास इस बात का गवाह है कि धार्मिक ध्रुवीकरण और राजनीतिक स्वार्थ का सबसे बड़ा नुकसान आम जनता को उठाना पड़ता है। इसलिए चुनावी राजनीति में धार्मिक मुद्दों का इस्तेमाल न केवल लोकतांत्रिक मूल्यों के विरुद्ध है, बल्कि राज्य की सामाजिक शांति के लिए भी गंभीर खतरा है।

पंजाब ने 1980 और 1990 के दशक के शुरुआती वर्षों में अपने इतिहास का सबसे कठिन दौर देखा। आतंकवाद, अलगाववाद और सरकारी कार्रवाई के बीच हजारों लोगों की जान गई। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 1981 से 1993 के बीच उग्रवाद से जुड़ी हिंसा में 21 हजार से अधिक लोगों की मृत्यु हुई। इस दौर ने पंजाब की सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक संरचना को गहरा आघात पहुंचाया। भय, असुरक्षा और अविश्वास ने सामान्य जनजीवन को प्रभावित किया और राज्य की विकास यात्रा कई वर्षों तक बाधित रही।

हालांकि पंजाब का इतिहास केवल संघर्ष और हिंसा का इतिहास नहीं है। यह साहस, बलिदान और राष्ट्र निर्माण में अतुलनीय योगदान का भी इतिहास है। हरित क्रांति के माध्यम से पंजाब ने देश को खाद्यान्न उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाने में निर्णायक भूमिका निभाई और “भारत का अन्न भंडार” कहलाया। आकार में छोटा होने के बावजूद राज्य ने राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा में असाधारण योगदान दिया। यही कारण है कि पंजाब की पहचान उसके विकास, मेहनत और सामाजिक सद्भाव से होनी चाहिए, न कि अतीत की त्रासदियों से।

13 अप्रैल 1978 को अखंड कीर्तनी जत्था, दमदमी टकसाल और निरंकारी समुदाय के बीच हुए टकराव के बाद हालात धीरे-धीरे बिगड़ने लगे। इसके बाद उग्रवाद ने राज्य को अपनी चपेट में ले लिया। धार्मिक स्थलों का इस्तेमाल चरमपंथी गतिविधियों के लिए होने लगा और स्थिति इतनी गंभीर हो गई कि जून 1984 में ऑपरेशन ब्लू स्टार चलाना पड़ा। इस सैन्य कार्रवाई ने सिख समुदाय की भावनाओं को गहरी चोट पहुंचाई और इसके बाद की घटनाओं ने पूरे देश को झकझोर दिया। उसी वर्ष प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या और उसके बाद सिख विरोधी दंगों ने समाज में अविश्वास की खाई और गहरी कर दी।

इसके बाद ऑपरेशन ब्लैक थंडर के माध्यम से सुरक्षा बलों ने अपेक्षाकृत अधिक संयम और पारदर्शिता के साथ उग्रवादियों के खिलाफ कार्रवाई की, जिससे जनता में कम असंतोष पैदा हुआ। धीरे-धीरे लोगों का समर्थन आतंकवादी संगठनों से खत्म होता गया और 1993 तक उग्रवाद काफी हद तक समाप्त हो गया। इस पूरी प्रक्रिया में पंजाब के लोगों ने असाधारण धैर्य और सामाजिक परिपक्वता का परिचय दिया। 1984 जैसी दर्दनाक घटनाओं के बावजूद पंजाब में व्यापक सांप्रदायिक प्रतिशोध नहीं हुआ, जो राज्य की सामाजिक एकता की सबसे बड़ी मिसाल है।

उग्रवाद के दौर ने केवल जान-माल का नुकसान नहीं किया, बल्कि पंजाब की अर्थव्यवस्था को भी गंभीर रूप से प्रभावित किया। उद्योगों में निवेश घटा, व्यापार प्रभावित हुआ, युवाओं का पलायन बढ़ा और विकास की गति धीमी पड़ गई। इन घटनाओं के सामाजिक और आर्थिक दुष्प्रभाव आज भी पूरी तरह समाप्त नहीं हुए हैं। यही कारण है कि उस दौर की पीड़ा को राजनीतिक लाभ के लिए बार-बार उभारना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं कहा जा सकता।

हाल के वर्षों में अतीत से जुड़े मुद्दों और घटनाओं को लेकर फिर से राजनीतिक विवाद खड़े किए जा रहे हैं। फिल्मों, ऐतिहासिक घटनाओं और धार्मिक प्रतीकों को लेकर होने वाली राजनीति समाज में नई बहसों और विभाजन की आशंका पैदा करती है। इतिहास को छिपाना भी उचित नहीं है और उसे राजनीतिक हथियार बनाना भी लोकतांत्रिक समाज के लिए नुकसानदेह है। इतिहास का उद्देश्य समाज को सबक देना होना चाहिए, न कि लोगों के बीच अविश्वास और वैमनस्य फैलाना।

दुनिया के कई देशों ने अपने इतिहास के कठिन अध्यायों को ईमानदारी से स्वीकार किया है। जर्मनी इसका उदाहरण है, जहां नाजी शासन और कंसंट्रेशन कैंपों को इतिहास के स्मारक के रूप में संरक्षित रखा गया है ताकि आने वाली पीढ़ियां फासीवाद और नफरत की भयावहता को समझ सकें। भारत में भी पंजाब के इतिहास को इसी दृष्टिकोण से देखा जाना चाहिए—सीखने और समझने के लिए, न कि चुनावी ध्रुवीकरण के लिए।

आज पंजाब नई चुनौतियों का सामना कर रहा है। नशीले पदार्थों की तस्करी, संगठित अपराध, अंतरराष्ट्रीय आपराधिक नेटवर्क, बेरोजगारी, कृषि संकट और युवाओं का भविष्य ऐसे विषय हैं, जिन पर गंभीर सार्वजनिक बहस और ठोस नीतिगत समाधान की आवश्यकता है। यदि चुनावी अभियान इन वास्तविक मुद्दों पर केंद्रित होंगे, तभी लोकतंत्र मजबूत होगा और जनता का विश्वास बढ़ेगा।

पंजाब ने विभाजन, आतंकवाद और सांप्रदायिक तनाव की भारी कीमत चुकाई है। इसलिए राजनीतिक दलों की जिम्मेदारी है कि वे चुनावी लाभ के लिए धार्मिक भावनाओं को भड़काने या पुराने घावों को कुरेदने से बचें। लोकतंत्र की सफलता तभी संभव है जब चुनाव समाज को जोड़ने का माध्यम बनें, तोड़ने का नहीं। पंजाब का भविष्य शांति, सामाजिक सद्भाव, आर्थिक विकास और युवाओं के अवसरों में निहित है। यही वे मुद्दे हैं जिन्हें चुनावी बहस का केंद्र बनाया जाना चाहिए, ताकि राज्य की प्रगति और सामाजिक एकता दोनों सुरक्षित रह सकें।

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