लेखक: अरविंद मोहन
भारत में चुनावी राजनीति के हर दौर में प्रवासी मजदूरों का मुद्दा किसी न किसी रूप में सामने आ ही जाता है। चाहे बिहार हो, पंजाब, दिल्ली या केरल—हर राज्य में मजदूरों का पलायन एक बड़ी सामाजिक और राजनीतिक हकीकत बन चुका है। चुनाव के समय इन मजदूरों का वोट अहम माना जाता है, लेकिन उनके जीवन, समस्याओं और अधिकारों पर गंभीर ध्यान कम ही दिया जाता है।
केरल जैसे राज्य, जहां बड़ी संख्या में बिहारी, झारखंडी, बंगाली, असमिया और ओडिया मजदूर काम करते हैं, वहां की अर्थव्यवस्था तक इन पर निर्भर हो गई है। इनके अनुसार बाजार, परिवहन और रहने की व्यवस्थाएं ढल चुकी हैं। फिर भी, जब चुनाव आते हैं तो इन मजदूरों को अपने गृह राज्यों—जैसे बंगाल और असम—लौटना पड़ता है, ताकि वे मतदान कर सकें।
इस बार की स्थिति थोड़ी अलग है। न तो राजनीतिक दलों की ओर से प्रवासी मजदूरों को लाने-ले जाने की विशेष सक्रियता दिख रही है, और न ही पहले जैसी चुनावी ‘मेहमाननवाजी’। अब मजदूरों को खुद ही अपने संसाधनों से घर लौटना पड़ रहा है। हालांकि, सोशल मीडिया के कारण उनकी समस्याएं कुछ अधिक सामने जरूर आई हैं, खासकर रसोई गैस जैसी बुनियादी जरूरतों की कमी को लेकर।
असल समस्या इससे कहीं गहरी है। देश में आज भी प्रवासी मजदूरों की कोई सटीक और आधिकारिक गणना उपलब्ध नहीं है। अलग-अलग स्रोत—जैसे नेशनल सैंपल सर्वे और अन्य सरकारी आंकड़े—आपस में मेल नहीं खाते। कई बार सरकार भविष्य निधि (पीएफ) खातों के आधार पर मजदूरों की संख्या बताने की कोशिश करती है, जो वास्तविक स्थिति को नहीं दर्शाती।
ऐसे में जब वर्षों की देरी के बाद जनगणना की प्रक्रिया शुरू हो रही है, तो यह एक महत्वपूर्ण अवसर है। घर-घर जाकर की जाने वाली इस गणना में प्रवासी मजदूरों को एक अलग और स्पष्ट श्रेणी के रूप में शामिल करना बेहद जरूरी है। यह काम किसी कृत्रिम बुद्धिमत्ता या अनुमान से नहीं, बल्कि जमीनी स्तर पर ही संभव है।
यदि प्रवासी मजदूरों की वास्तविक संख्या सामने आ जाए, तो सरकारों और नीति-निर्माताओं के लिए उनकी जरूरतों के अनुसार योजनाएं बनाना संभव होगा। आज स्थिति यह है कि न उनके जन्म-मृत्यु के सही आंकड़े हैं, न उनकी आय, न ही उनके जीवन स्तर का स्पष्ट आकलन। उनकी कमाई को घर भेजने की प्रक्रिया भी कई बार जटिल और शोषण से भरी होती है।
कोरोना काल के दौरान देश ने प्रवासी मजदूरों की दुर्दशा को करीब से देखा। अगर उनके बारे में ठोस आंकड़े और पंजीकरण व्यवस्था होती, तो शायद उनकी स्थिति कुछ बेहतर हो सकती थी। वर्षों पहले बनी अंतरराज्यीय प्रवासी मजदूर कानून की व्यवस्था भी अब लगभग अप्रभावी हो चुकी है।
लोकतंत्र में संख्या का महत्व बहुत बड़ा होता है। जब तक प्रवासी मजदूरों की सही संख्या सामने नहीं आएगी, तब तक न तो उनकी समस्याएं प्राथमिकता बनेंगी और न ही उनकी आवाज को उचित प्रतिनिधित्व मिलेगा।
