पूरन चंद सरीन..
शिक्षा को लेकर हंगामा बरपा है। पढ़े लिखे बेरोजगारों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। शिक्षा संस्थान कुव्यवस्था, भ्रष्टाचार और विद्यार्थियों के जीवन से खिलवाड़ करने का अड्डा बन चुके हैं। पड़ताल करें तो सच का सामना होते देर नहीं लगेगी। शिक्षा मंत्रियों की उदासीनता रू हकीकत है कि आजादी के बाद से जितने भी महानुभाव इस पद पर आसीन हुए, उनकी शिक्षा प्रणाली बनाने और एक ऐसी नीति निर्धारण करने में न रुचि थी न योग्यता, जिससे भारत का भविष्य अर्थात बच्चे और युवा जुड़ सकें। सबसे पहले मौलाना अबुल कलाम आजाद, जिन्होंने 1947 से 1958 तक पढ़ाई-लिखाई के लिए अंग्रेजों की मैकाले पद्धति और पारंपरिक इस्लामी शिक्षा को लागू रखने के अलावा कोई उल्लेखनीय कार्य नहीं किया।
वैसे उन्हें भारतीय शिक्षा का शिल्पकार कहा जाता है क्योंकि पंडित नेहरू के विशेष कृपा पात्र होने से उनके नेतृत्व में यू.जी.सी. और वैज्ञानिक शिक्षा की नींव रखी गई लेकिन वे भूल गए कि देश को मजबूत शिक्षा नीति की जरूरत है। विरोधाभास शुरू हुआ। देश ने विश्वस्तरीय उच्च शिक्षण संस्थान बनाए, परंतु प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा को कोई महत्व नहीं मिला। शिक्षा का एक ऐसा ढांचा विकसित हुआ, जिसमें कुछ संस्थान छोड़कर अधिकांश स्कूल औसत या कमजोर बने रहे। उनके बाद के.एल. श्रीमाली, हुमायूं कबीर, एम.सी. छागला, फखरुद्दीन अली अहमद 1967 तक रहे, जिनकी डिग्रियां उनके व्यवसाय के अनुसार थीं लेकिन शिक्षा के मामले में निल बटा सन्नाटा।
1968 में महान शिक्षाविद् दौलत सिंह कोठारी के नेतृत्व में पहली शिक्षा नीति बनी। इसे आधे-अधूरे मन से थोड़ा-बहुत लागू किया लेकिन महत्वपूर्ण सिफारिशों को कचरे में फैंक दिया। त्रिगुणा सेन और डॉक्टर वी.के.आर.वी. राव से लेकर नूरुल हसन जैसे महानुभाव आए, जिनकी कोई बात नहीं सुनी गई। बाकियों के पास स्नातक या उसके आसपास की डिग्रियां थीं लेकिन उनके नाम कोई ऐसा कारनामा नहीं, जो शिक्षा व्यवस्था को सुधारने के लिए किया हो। शिक्षक सबसे कमजोर कड़ी रू किसी भी शिक्षा प्रणाली की गुणवत्ता उसके शिक्षकों से तय होती है।
फिनलैंड में शिक्षक बनने के लिए सर्वश्रेष्ठ विद्यार्थियों का चयन होता है। जापान में शिक्षक को सामाजिक सम्मान प्राप्त है। दक्षिण कोरिया में शिक्षक राष्ट्रीय विकास के भागीदार माने जाते हैं। भारत में आज भी हजारों पद रिक्त हैं। प्रशिक्षण की गुणवत्ता असमान है। अनेक शिक्षक प्रशासनिक कार्यों में उलझे रहते हैं। जब शिक्षक ही सशक्त नहीं होगा तो विद्यार्थी कैसे होगा? राजीव गांधी जब प्रधानमंत्री बने तो 1986 में नई शिक्षा नीति सामने आई, जिसमें कम्प्यूटर शिक्षा पर जोर दिया। अब तक की दोनों नीतियों में शिक्षक की कहीं कोई भूमिका नहीं थी। उनके लिए कोर्स बने लेकिन जब वे पढने के बाद पढ़ाने गए तो पता चला कि विद्यार्थियों को साधारण अक्षर ज्ञान और गणित के जमा-घटा तक का ज्ञान नहीं है।
वे कुछ बोलते तो प्रशासनिक अधिकारी यह कहकर चुप करा देते कि तुम्हें हमसे ज्यादा नॉलेज है तो इसे अपने पास रखो। नीति इतनी व्यापक थी कि घोटाले करने की पूरी छूट थी। पढना-लिखना इतना महंगा हो गया कि अमीर लोगों की जेब में समा गया। यही नहीं, एक कमरे के विश्वविद्यालय अस्तित्व में आ गए और घर के मामूली पढ़े-लिखे चांसलर हो गए। नाम के आगे डॉक्टर लगाना तो मामूली बात थी। सरकारें बदलीं लेकिन लक्ष्य यही रहा कि अंधा बांटे रेवड़ी, फिर-फिर अपने को दे। रटंत विद्या का बोलबाला हुआ, चीटिंग की आदत ने कबाड़ा किया और सभी नामचीन या अंधेरी गलियों में खुले खोखे सिर्फ नोट छापने की मशीन बन गए। भाजपा सरकार ने तो 12वीं पास स्मृति ईरानी को शिक्षा की बागडोर सौंप दी।
धर्मेंद्र प्रधान तक पूरा हिसाब-किताब जोड़कर देख लीजिए कि क्या किसी भी दल की सरकार ने शिक्षा को गंभीरता से लिया? निष्कर्ष ‘नहीं’ में निकलेगा। इसका कारण यह है कि इनमें से कोई इतिहासकार और कानून का जानकार होने का दावा भले ही करे लेकिन शिक्षा प्रणाली या नीति बनाने में कोई रुचि न थी। यह काम विभिन्न आयोगों और नौकरशाही के हाथ का खिलौना बनकर रह गए। 1968 की पहली शिक्षा नीति का शिक्षा पर 6 फीसदी खर्च का लक्ष्य आज तक अधर में लटका हुआ है। तीन भाषा फार्मूला विवादों का पिटारा और सबसे अधिक गिरावट ग्रामीण क्षेत्रों की अनदेखी के कारण हुई। भानुमति का कुनबा और जादू की छड़ी घूमते ही पूरे देश में शिक्षा क्रांति करने के लिए 2020 की राष्ट्रीय शिक्षा नीति ने घोषणाओं की झड़ी लगा दी, जिन्हें पूरा करना ईश्वर के अधिकार में तो हो सकता है लेकिन इंसान तो अगले सौ साल में भी नहीं कर सकता।
शिक्षा एक व्यापार और अयोग्यता तथा पैसे के बल पर करोड़ों रुपए कमाने का अवसर बन गई, जिसकी एकमात्र शर्त शातिर होना है। भारत में दुनिया की सबसे बड़ी स्कूली शिक्षा प्रणालियों में से एक है। विशाल उच्च शिक्षा नैटवर्क, वैश्विक उत्कृष्ट संस्थान और बड़ी युवा आबादी होने के बावजूद कोई ऐसा नहीं, जो इसे विश्वस्तरीय शिक्षा महासागर बना सके। ऐसे अनेक विद्वान हैं लेकिन वे नक्कारखाने में तूती की तरह हैं। पैसा प्रधान होने से विद्वता को मुंह की खानी पड़ती है।
