प्रधानों को प्रशासक बनाने के फैसले पर हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार से मांगा जवाब

लखनऊ, 02 जून (यूएनएस)। उत्तर प्रदेश में ग्राम प्रधानों को प्रशासक नियुक्त किए जाने के राज्य सरकार के फैसले को चुनौती देने वाला मामला अब इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ पहुंच गया है। अदालत ने मंगलवार को इस मामले में राज्य सरकार से जवाब तलब करते हुए अगली सुनवाई 3 जून को निर्धारित की है।

न्यायमूर्ति शेखर बी. सराफ और न्यायमूर्ति अवधेश कुमार चौधरी की खंडपीठ ने यह आदेश जनहित याचिका पर प्रारंभिक सुनवाई के दौरान दिया। यह याचिका ओमप्रकाश प्रजापति की ओर से दाखिल की गई है, जिसमें राज्य सरकार के आदेश को कानून की मंशा के विपरीत बताया गया है।

याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता अमरेंद्र नाथ त्रिपाठी ने अदालत में कहा कि उत्तर प्रदेश पंचायत राज अधिनियम की धारा 12 (3) (क) के अनुसार ग्राम प्रधान का कार्यकाल शपथ ग्रहण की तिथि से अधिकतम पांच वर्ष का ही हो सकता है। ऐसे में पंचायत चुनाव समय पर न कराकर कार्यकाल समाप्त होने के बाद भी मौजूदा प्रधानों को प्रशासक बनाए रखना उनके कार्यकाल को अप्रत्यक्ष रूप से बढ़ाने जैसा है, जो कानून की भावना के अनुरूप नहीं है।

याचिका में यह भी कहा गया है कि पूर्व में जब पंचायत चुनाव समय पर नहीं हो पाते थे, तब ग्राम पंचायतों के संचालन के लिए सहायक विकास अधिकारी (पंचायत) या अन्य सरकारी अधिकारियों को प्रशासक नियुक्त किया जाता था। इसलिए इस बार भी किसी सक्षम सरकारी अधिकारी को प्रशासक बनाया जाना चाहिए था, न कि उन ग्राम प्रधानों को जिनका वैधानिक कार्यकाल समाप्त हो चुका है।

सुनवाई के दौरान अदालत ने राज्य सरकार की ओर से उपस्थित अधिवक्ता को निर्देश दिया कि वह सरकार से आवश्यक जानकारी प्राप्त कर बुधवार को अदालत के समक्ष अपना पक्ष प्रस्तुत करें।

गौरतलब है कि प्रदेश की सभी 57 हजार 694 ग्राम पंचायतों का कार्यकाल 26 मई को समाप्त हो गया था। इसके एक दिन पहले 25 मई को राज्य सरकार ने आदेश जारी कर पंचायत चुनाव होने तक अथवा अधिकतम छह महीने के लिए मौजूदा ग्राम प्रधानों को प्रशासक नियुक्त कर दिया था।

सरकार द्वारा जारी आदेश में स्पष्ट किया गया है कि प्रशासक के रूप में कार्य कर रहे ग्राम प्रधान कोई बड़ा या नीतिगत निर्णय नहीं ले सकेंगे। यदि किसी विशेष अथवा आवश्यक परिस्थिति में ऐसा निर्णय लेना जरूरी होगा, तो उसका प्रस्ताव जिला पंचायत राज अधिकारी के माध्यम से जिलाधिकारी को भेजा जाएगा। जिलाधिकारी की स्वीकृति मिलने के बाद ही उस पर अंतिम निर्णय लिया जा सकेगा।

अब इस मामले में राज्य सरकार के जवाब और कानूनी पक्ष पर सभी की नजरें टिकी हैं। हाईकोर्ट में 3 जून को होने वाली अगली सुनवाई में इस महत्वपूर्ण मुद्दे पर आगे की दिशा तय हो सकती है।

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