जी-7 मंच से मोदी का संदेश: दुनिया संसाधनों की नहीं, भरोसे की कमी से जूझ रही

नई दिल्ली,17 जून।  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जी-7 शिखर सम्मेलन में वैश्विक साझेदारियों और अंतरराष्ट्रीय एकजुटता को मजबूत करने की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा कि आज के दौर में सबसे बड़ी रणनीतिक ताकत आपसी विश्वास है, लेकिन दुनिया इस समय भरोसे के गंभीर संकट का सामना कर रही है। उन्होंने कहा कि देशों के बीच भविष्य की साझेदारियां तभी सफल हो सकती हैं, जब विश्वास को फिर से स्थापित किया जाए।

‘नई साझेदारियां और अंतरराष्ट्रीय एकजुटता का पुनर्निर्माण’ विषय पर आयोजित सत्र को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि आज दुनिया पहले से कहीं अधिक परस्पर जुड़ी हुई है। ऊर्जा सुरक्षा, खाद्य सुरक्षा, स्वास्थ्य सुरक्षा, साइबर सुरक्षा और आर्थिक समृद्धि अब किसी एक देश की सीमाओं तक सीमित नहीं रह गई है। ऐसे में वैश्विक चुनौतियों का समाधान भी सामूहिक प्रयासों से ही संभव है।

प्रधानमंत्री ने कहा कि तकनीक, डेटा, पूंजी और आपूर्ति श्रृंखलाएं पूरी दुनिया को जोड़ती हैं। इसलिए यह विश्वास होना चाहिए कि इनका उपयोग मानवता के कल्याण के लिए होगा, न कि उन्हें हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जाएगा। उन्होंने कहा कि विकास के अवसर कुछ देशों तक सीमित नहीं रहने चाहिए और वैश्विक संस्थाओं को सभी देशों की आकांक्षाओं को पूरा करने में सक्षम होना चाहिए।

पश्चिम एशिया की स्थिति पर चिंता व्यक्त करते हुए मोदी ने क्षेत्र में शांति बहाली के प्रयासों का स्वागत किया। उन्होंने कहा कि जारी संघर्ष के कारण मित्र देशों को भारी नुकसान उठाना पड़ा है। होर्मुज जलमार्ग में समुद्री व्यापार प्रभावित होने से वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी असर पड़ा है। प्रधानमंत्री ने कहा कि इस संघर्ष में कई भारतीय नागरिकों और नाविकों की भी जान गई है।

उन्होंने कहा कि समुद्री व्यापार वैश्विक अर्थव्यवस्था की रीढ़ है और समुद्री मार्गों की सुरक्षा सुनिश्चित करना पूरी दुनिया की साझा जिम्मेदारी है। नाविकों को सुरक्षित वातावरण मिलना चाहिए ताकि वे बिना किसी भय के अपना कार्य कर सकें।

प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि पिछली सदी में मानवता ने दो विश्व युद्धों का दर्द झेला और भारी बलिदानों के बाद शांति तथा स्थिरता की वैश्विक व्यवस्था बनाई गई। लेकिन वर्षों में निर्मित यह विश्वास अब कमजोर पड़ता दिख रहा है। उन्होंने कहा कि कोविड महामारी ने दुनिया को यह एहसास कराया कि वैश्विक एकजुटता और सहयोग के दावे कई बार व्यवहार में कमजोर साबित हुए।

उन्होंने कहा, “आज दुनिया संसाधनों की कमी से नहीं बल्कि भरोसे की कमी से जूझ रही है। हमारी साझेदारियों का भविष्य इसी विश्वास को दोबारा मजबूत करने पर निर्भर करता है।”

अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन के प्रसिद्ध कथन ‘ट्रस्ट बट वेरिफाई’ का उल्लेख करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि आने वाली पीढ़ियों के लिए विश्वास आधारित और नियमों से संचालित वैश्विक व्यवस्था तैयार करना हम सभी की जिम्मेदारी है।

कोविड महामारी के दौरान भारत की भूमिका का उल्लेख करते हुए मोदी ने कहा कि भारत ने 150 से अधिक देशों को दवाइयां और वैक्सीन उपलब्ध कराईं। उन्होंने कहा कि किसी भी साझेदारी की असली कसौटी यह नहीं है कि हम दूसरों के लिए क्या बनाते हैं, बल्कि यह है कि हम उन्हें आत्मनिर्भर बनने में कितना सक्षम बनाते हैं।

प्रधानमंत्री ने ग्लोबल साउथ की आवाज उठाते हुए कहा कि विकासशील देशों को केवल सहायता नहीं बल्कि समान भागीदारी चाहिए। उन्होंने कहा कि इन देशों को वैश्विक विकास प्रक्रिया का लाभार्थी नहीं बल्कि भागीदार बनाया जाना चाहिए। इसके लिए ‘दाता और प्राप्तकर्ता’ की सोच से आगे बढ़कर सम्मान और समानता पर आधारित साझेदारी विकसित करनी होगी।

जी-7 सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी, ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर तथा संयुक्त अरब अमीरात के राष्ट्रपति मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान से भी मुलाकात की।

प्रधानमंत्री ने कहा कि यदि दुनिया को स्थायी शांति, समावेशी विकास और सुरक्षित भविष्य सुनिश्चित करना है तो विश्वास, संवाद, कूटनीति और सहयोग को ही वैश्विक व्यवस्था का आधार बनाना होगा।

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