संवैधानिक संस्थाओं की भूमिका और विपक्ष की चुनौतियां

राजेश पांडेय ……. (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

भारत में केंद्र और राज्य की सरकारें वयस्क मताधिकार के आधार पर चुनी जाती हैं। शहर से लेकर गांवों तक लोग अपने प्रतिनिधियों का चुनाव वोट के माध्यम से करते हैं। सभी चुनावों में स्थानीय स्तर पर हेराफेरी की घटनाएं होती रही हैं। मतदान केंद्रों पर कब्जा, फर्जी वोटिंग, मतगणना में गड़बड़ी जैसे मामले सामने आते रहे हैं। फिर भी राष्ट्रीय स्तर पर चुनावों की शुद्धता और पवित्रता संदेह से परे रहती थी। लेकिन अब स्थिति बदल गई है। पहले वोटर सरकार चुनते थे, अब सत्ताधारी पार्टी तय कर रही है कि वोटर कौन रहेगा और कौन नहीं। कम से कम मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) की प्रक्रिया से तो यही तस्वीर उभरती है।

धांधली के आरोपों, विसंगतियों और खामियों की कहीं सुनवाई नहीं है। संवैधानिक संस्थाओं से इंसाफ की उम्मीद खत्म होती जा रही है। स्वस्थ और सच्चे लोकतंत्र की पहली शर्त स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव हैं। अब इसकी गारंटी नहीं रही। चुनावों में गड़बड़ी के आरोपों की सूची दिन-ब-दिन लंबी होती जा रही है। हम दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र होने पर गर्व करते हैं, लेकिन हकीकत एकदम अलग है।

स्वयंसेवी संगठनों—एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) और महाराष्ट्र स्थित वोट फॉर डेमोक्रेसी—ने 2019 और 2024 के लोकसभा चुनावों में कई विसंगतियों का जिक्र किया है। दोनों चुनावों में कुल मतदान और गिने गए वोटों की संख्या में अंतर पाया गया है। मतदान के आंकड़े काफी विलंब से जारी हो रहे हैं। वोटिंग के आखिरी घंटों में मतदाताओं की संख्या में भारी बढ़ोतरी चिंताजनक और अविश्वसनीय है। एडीआर ने चुनाव आयोग को कई मौकों पर पत्र लिखकर इन पहलुओं की ओर उसका ध्यान आकर्षित कराया है, लेकिन संतोषजनक जवाब नहीं मिले हैं।

चुनाव आयोग की मनमानी पर कोई अंकुश नहीं है। इसका असर हर जगह दिखाई पड़ रहा है। आम चुनाव के साथ विधानसभा चुनाव भी संदेह के दायरे में हैं। महाराष्ट्र, हरियाणा और पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में इसके संकेत मिले हैं। अपेक्षाकृत महत्वहीन चुनाव तक धांधली की चपेट में आ रहे हैं। चंडीगढ़ मेयर चुनाव में निर्वाचन अधिकारी गड़बड़ी करते रंगे हाथों पकड़े जा चुके हैं। मध्य प्रदेश में राज्यसभा की एक सीट के लिए कांग्रेस प्रत्याशी मीनाक्षी नटराजन का नामांकन पत्र खारिज करने की ताजा घटना इसकी अगली कड़ी है। यह मामला सुप्रीम कोर्ट में है।

देश की सर्वोच्च अदालत से अनियमितताओं को रोकने की उम्मीद की जाती है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को अहम मामलों में क्लीन चिट दे दी है। खासतौर पर एसआईआर को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर 27 मई को आए फैसले में वोटरों के अधिकारों की रक्षा की चिंता दिखाई नहीं देती। कोर्ट ने कहा है कि चुनाव आयोग को एसआईआर कराने का संवैधानिक और कानूनी अधिकार है। अदालत ने यह जरूर माना है कि आयोग नागरिकता तय नहीं कर सकता, यह केंद्र सरकार का काम है। फिर भी एसआईआर की जटिलताओं और खामियों पर उसने पर्याप्त गौर नहीं किया है।

सुप्रीम कोर्ट ने विधानसभा चुनावों से पहले कुछ राज्यों में हड़बड़ी में कराई गई प्रक्रिया के बारे में कुछ नहीं कहा है। आयोग को किसी बिंदु पर जवाबदेह नहीं ठहराया गया है। अब तक मतदाता सूची में नाम दर्ज करने और हटाने की प्रक्रिया अपेक्षाकृत पारदर्शी और आसान रही है। हर साल वोटर लिस्ट का संक्षिप्त संशोधन (समरी रिवीजन) होता है। चुनाव आयोग 18 वर्ष से अधिक आयु के नए मतदाताओं को शामिल करने के लिए अभियान चलाता है। लेकिन लगता है कि एसआईआर के जरिए नाम जोड़ने के बजाय हटाने की मुहिम चलाई जा रही है।

लगातार खबरें आ रही हैं कि सबसे अधिक नाम अल्पसंख्यकों और दलितों के हटाए गए हैं। दरअसल, भारत में ऐसे लोगों की संख्या बहुत बड़ी है जिनके पास कई जरूरी दस्तावेज नहीं हैं। इनमें अधिकतर लोग कमजोर और गरीब वर्गों से आते हैं। भला सोचिए, दूरदराज के कस्बों और गांवों में रहने वाले लोगों के लिए दस्तावेज जुटाना कितना कठिन है। गनीमत है कि सुप्रीम कोर्ट ने एसआईआर के आवश्यक दस्तावेजों में आधार कार्ड को शामिल कराया है। अनुमान है कि 2026 की शुरुआत तक 134 करोड़ लोग आधार का उपयोग कर रहे थे।

चुनाव आयोग का काम स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराना है। उसे सुनिश्चित करना चाहिए कि कोई भी पात्र मतदाता अपने मताधिकार के इस्तेमाल से वंचित न रह जाए। लेकिन यहां उल्टा होता दिखाई दे रहा है। एसआईआर के तहत करोड़ों मतदाताओं को मतदाता सूची से बाहर करने का अभियान चल रहा है। कुछ विशेषज्ञों के अनुमान के अनुसार यह संख्या लगभग साढ़े छह करोड़ तक हो सकती है। पश्चिम बंगाल में अप्रैल-मई में हुए विधानसभा चुनावों में ‘तार्किक विसंगति’ जैसे नए मापदंड के तहत 27 लाख मतदाताओं का मताधिकार समाप्त कर दिया गया। तमिलनाडु में 97 लाख लोग सूची से बाहर हुए हैं। बिहार में 25 लाख मतदाताओं को जगह नहीं मिली है। सबसे अधिक लोकसभा सीटों वाले राज्य उत्तर प्रदेश में एक करोड़ से अधिक मतदाता अधर में हैं।

जाहिर है, ये हालात लोकतंत्र के लिए शुभ नहीं हैं। संवैधानिक संस्थाओं की चुप्पी के कारण चुनावी मुकाबला बराबरी का नहीं रह गया है। दौड़ शुरू होने से पहले ही सत्ताधारी दल निर्णायक बढ़त की स्थिति में दिखाई देता है। ऐसी स्थिति में विपक्षी दलों के सामने कठिन चुनौतियां हैं। उनके अपने विरोधाभास और मतभेद भी कम नहीं हैं। कई राज्यों में उनके हित आपस में टकराते हैं।

2023 में बने इंडिया गठबंधन के सदस्य कई मौकों पर अलग-अलग दिशाओं में चलते दिखाई देते हैं। लेकिन इस समय उसने एसआईआर के खिलाफ एकजुटता दिखाई है। 8 जून को हुई बैठक में आम सहमति से एसआईआर को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने का इरादा जताया गया। विपक्ष का कहना है कि एसआईआर का उपयोग चुनाव परिणामों को प्रभावित करने के लिए किया जा रहा है। बैठक में यह चिंता भी व्यक्त की गई कि मतदाता सूचियों में गड़बड़ी कर बड़े पैमाने पर लोगों को मताधिकार से वंचित किया जा रहा है।

एसआईआर को लेकर विपक्ष के सवाल जायज हैं। इसके बावजूद इसे नई कानूनी चुनौती देने के परिणामों पर अभी कुछ कहना मुश्किल है। कानूनी रास्ते अपनी जगह हैं, लेकिन विपक्ष के लिए मैदानी मोर्चे को संभालना ज्यादा जरूरी है। 8 जून की बैठक में गठबंधन के मतभेद भी सामने आए। सहयोगी दलों ने कहा कि तमिलनाडु, केरल और पश्चिम बंगाल में कांग्रेस की रणनीति ने गठबंधन के प्रमुख सहयोगियों—द्रमुक, तृणमूल कांग्रेस और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी—को नुकसान पहुंचाया है।

निश्चित तौर पर कांग्रेस को अपनी रणनीति पर नए सिरे से विचार करना होगा। तमिलनाडु में वह द्रमुक को छोड़कर अभिनेता विजय की पार्टी के साथ सरकार में शामिल हो चुकी है। कांग्रेस के रणनीतिकार इसे भविष्य की नीति मानते हैं। उनकी सोच है कि तमिलनाडु की राजनीति द्रविड़ दलों के प्रभाव क्षेत्र से निकलकर दूसरी दिशा में बढ़ रही है। बंगाल में तृणमूल के साथ उसके मेलजोल की हलचल तेज है। केरल में यूडीएफ गठबंधन की प्रमुख पार्टी कांग्रेस का वामपंथियों (एलडीएफ) से सीधा राजनीतिक टकराव है।

सीपीएम की आपत्ति कांग्रेस नेताओं, खासकर राहुल गांधी और प्रियंका गांधी द्वारा मुख्यमंत्री पिनराई विजयन पर किए जाने वाले व्यक्तिगत हमलों से जुड़ी है। वहां कांग्रेस और वामपंथियों के रास्ते अलग हैं, लेकिन चुनाव अभियान में बार-बार निजी हमलों से बचा जा सकता है। बंगाल में कांग्रेस चुनाव से पहले ही तृणमूल के साथ मिलकर चल सकती थी। इससे एसआईआर के जरिए हुई कथित धांधली का मुकाबला करने में कुछ मदद मिल सकती थी।

बंगाल में अब तक कांग्रेस की रणनीति को अधीर रंजन चौधरी जैसे नेता प्रभावित करते रहे हैं। वे तृणमूल की नेता ममता बनर्जी के कट्टर आलोचक हैं। कांग्रेस ऐसे नेताओं से अलग हटकर नई राजनीतिक वास्तविकताओं के हिसाब से अपनी रणनीति तय कर सकती है।

अपने ऐतिहासिक अतीत, लंबे समय तक देश पर शासन करने, मौजूदा लोकसभा में 100 सीटों और चार राज्यों में सरकार होने के कारण इंडिया गठबंधन को आगे बढ़ाने में कांग्रेस की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसलिए उसे अपने सहयोगियों की महत्वाकांक्षाओं, जरूरतों और जमीनी स्थिति को ध्यान में रखकर कदम उठाने होंगे।

देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में इस समय समाजवादी पार्टी के हाथ में विपक्ष की कमान है। लिहाजा कांग्रेस के लिए सपा के पीछे चलना व्यावहारिक राजनीति होगी। विधानसभा चुनाव में दोनों दलों को सीटों के बंटवारे में वास्तविक स्थिति का ध्यान रखना पड़ेगा। वे अपने नफा-नुकसान का आकलन करें, लेकिन यह भी सुनिश्चित करें कि महत्वाकांक्षा, टकराव और जिद से विपक्षी चुनौती कमजोर न हो जाए।

देश की वर्तमान स्थिति को देखते हुए विपक्ष को अपना हर मोर्चा दुरुस्त करना होगा। उसे हर राज्य में कड़ी चुनौती पेश करने की परिस्थितियां बनानी चाहिए। जब संवैधानिक संस्थाएं अपनी जिम्मेदारी से पीछे हटने लगती हैं, तो उन्हें रास्ते पर लाने में विपक्षी दलों की एकजुटता भी प्रभावी भूमिका निभा सकती है।

संवैधानिक संस्थाएं सत्ता और उसके अन्य अंगों की असंवैधानिक तथा गैरकानूनी कार्रवाइयों को रोकने का सबसे प्रभावी औजार हैं। यदि वे अपनी जिम्मेदारियों का निर्वाह नहीं करेंगी तो सत्ता निरंकुश हो जाएगी और लोकतंत्र कमजोर पड़ जाएगा। निश्चय ही यह स्थिति गंभीर और निराशाजनक है। इसलिए विपक्ष की जिम्मेदारी और बढ़ गई है। वह अपनी मैदानी सक्रियता के जरिए जनता के एक बड़े वर्ग को उसके अधिकार हासिल करने में मदद कर सकता है।

भारत में मताधिकार हर व्यक्ति को सबके बराबर खड़े होने का अधिकार देता है। हमारे यहां वंचित वर्गों की सबसे बड़ी संपदा और ताकत उनका वोट है। उनके इस अधिकार की रक्षा करना हम सभी की जिम्मेदारी है।

 

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