आस्था का सम्मान, लालच और दबाव से धर्मांतरण स्वीकार नहीं : मोहन भागवत

त्रिशूर (केरल), 14 जून। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने कहा है कि किसी व्यक्ति द्वारा अपनी आस्था और इच्छा से धर्म परिवर्तन करने पर संघ को कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन लालच, दबाव, प्रलोभन या किसी दूसरे धर्म एवं परंपरा का अपमान करके कराया जाने वाला धर्मांतरण स्वीकार नहीं किया जा सकता।

केरल में बोले संघ प्रमुख, समाज को संगठित करना ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का मूल उद्देश्य

रविवार को केरल के त्रिशूर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी संपर्क कार्यक्रम के अंतर्गत आयोजित सभा को संबोधित करते हुए भागवत ने कहा कि संघ की स्थापना किसी समुदाय के विरोध, राजनीतिक सत्ता प्राप्त करने या लोकप्रियता हासिल करने के लिए नहीं की गई थी। इसका उद्देश्य राष्ट्र के पुनरुत्थान के लिए समाज को संगठित और सशक्त बनाना है।

उन्होंने कहा कि संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार का मानना था कि भारत को अतीत में विदेशी शक्तियों के अधीन होने का प्रमुख कारण समाज की आंतरिक कमजोरियां और विभाजनकारी प्रवृत्तियां थीं। इसलिए एक संगठित, अनुशासित और जागरूक समाज का निर्माण आवश्यक है।

भागवत ने कहा कि भारत की सांस्कृतिक और सभ्यतागत पहचान राष्ट्रीय एकता का आधार है। उन्होंने कहा, “हम विविधताओं के बावजूद एक साझा सांस्कृतिक विरासत और मूल्यों से जुड़े हुए हैं। यही राष्ट्रीय जीवन की शक्ति है।”

हिंदुत्व की अवधारणा पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि इसका अर्थ किसी धर्म विशेष के विरोध से नहीं है। यह विचार ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना पर आधारित है, जिसमें पूरी दुनिया को एक परिवार माना जाता है और सभी समुदायों के साथ सौहार्दपूर्ण सहअस्तित्व पर बल दिया जाता है।

संघ प्रमुख ने बताया कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का मुख्य कार्य चरित्रवान, अनुशासित, निस्वार्थ और समाजसेवा के लिए समर्पित व्यक्तियों का निर्माण करना है। उन्होंने कहा कि संघ से जुड़े स्वयंसेवक देशभर में एक लाख तीस हजार से अधिक सेवा कार्यों में सक्रिय हैं और समाज के विभिन्न क्षेत्रों में योगदान दे रहे हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का उदाहरण देते हुए भागवत ने कहा कि संघ के स्वयंसेवक विभिन्न क्षेत्रों में अपनी योग्यता और जिम्मेदारियों के आधार पर कार्य करते हैं तथा उनकी उपलब्धियों का श्रेय संघ नहीं लेता।

ईसाई समुदाय से जुड़े एक प्रश्न के उत्तर में उन्होंने कहा कि ईसाई समाज सदियों से भारत का अभिन्न हिस्सा रहा है और यहां सुरक्षित वातावरण में आगे बढ़ा है। उन्होंने कहा कि भारतीय समाज की मूल प्रकृति सभी को साथ लेकर चलने वाली है तथा संघ न तो हिंसा में विश्वास करता है और न ही उसका समर्थन करता है।

धर्मांतरण के मुद्दे पर उन्होंने स्पष्ट कहा कि यदि कोई व्यक्ति अपनी व्यक्तिगत आस्था के आधार पर धर्म बदलता है तो यह उसका अधिकार है, लेकिन जब धर्म परिवर्तन के पीछे लालच, प्रलोभन, दबाव या दूसरे धर्मों के प्रति अपमानजनक रवैया हो, तब चिंता पैदा होती है।

भागवत ने लोगों से कानून अपने हाथ में न लेने की अपील करते हुए कहा कि किसी भी विवाद या शिकायत का समाधान कानूनी और संवैधानिक तरीके से किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि सभी पक्षों को संयम बरतना चाहिए तथा हिंसा और टकराव से बचना चाहिए।

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