नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी में विलय का एलान, एनडीए के साथ काम करने के संकेत; ममता खेमे ने शुरू की जवाबी तैयारी
नई दिल्ली, 14 जून। तृणमूल कांग्रेस में लंबे समय से चल रही अंदरूनी खींचतान अब खुली बगावत में बदलती नजर आ रही है। पार्टी के बागी सांसदों ने बड़ा राजनीतिक कदम उठाते हुए त्रिपुरा की नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी में विलय का एलान कर दिया है। बागी खेमे का दावा है कि उसके साथ तृणमूल कांग्रेस के 28 में से 20 सांसद हैं, जो कुल संख्या के दो-तिहाई से अधिक हैं।
रविवार को बागी सांसदों के प्रतिनिधिमंडल ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से मुलाकात कर संसद में अलग बैठने की व्यवस्था की मांग की। प्रतिनिधिमंडल में काकोली घोष दस्तीदार, सुदीप बंद्योपाध्याय और शताब्दी राय समेत कई सांसद शामिल थे।
लोकसभा अध्यक्ष से मुलाकात के बाद काकोली घोष दस्तीदार ने कहा कि 20 सांसदों ने संयुक्त रूप से पत्र सौंपकर अलग पहचान की मांग की है। उन्होंने दावा किया कि बागी गुट तृणमूल कांग्रेस के दो-तिहाई सांसदों का समर्थन रखता है और अब नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी में विलय कर रहा है। उन्होंने कहा कि आगे चलकर यह समूह प्रधानमंत्री के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के साथ मिलकर देशहित में कार्य करेगा।
सुदीप बंद्योपाध्याय ने कहा कि संसदीय नियमों के तहत सीधे मूल दल पर दावा नहीं किया जा सकता, इसलिए पहले क्षेत्रीय दल में विलय का रास्ता अपनाया गया है। उन्होंने कहा कि जुलाई में यह समूह तृणमूल कांग्रेस के नाम और संगठन पर दावा करने की प्रक्रिया शुरू कर सकता है।
सूत्रों के अनुसार लोकसभा अध्यक्ष से मुलाकात से पहले बागी सांसदों ने केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव के आवास पर रणनीतिक बैठक की थी। बैठक में सायोनी घोष और माला राय भी मौजूद थीं।
बागी सांसदों का कहना है कि नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी में विलय का फैसला दलबदल विरोधी कानून के प्रावधानों को ध्यान में रखते हुए लिया गया है, ताकि सांसदों की सदस्यता पर कोई खतरा न आए।
उधर, तृणमूल कांग्रेस नेतृत्व ने भी इस घटनाक्रम के बाद जवाबी मोर्चा खोल दिया है। पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी ने लोकसभा अध्यक्ष को पत्र भेजकर पार्टी का पक्ष रखा है। तृणमूल सांसद कीर्ति आजाद और सागरिका घोष ने यह पत्र व्यक्तिगत रूप से लोकसभा अध्यक्ष को सौंपा।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि बागी सांसदों का दावा सही साबित होता है तो यह पश्चिम बंगाल की राजनीति में बड़ा बदलाव ला सकता है। वहीं, इस पूरे घटनाक्रम पर अब सबकी नजर लोकसभा अध्यक्ष के फैसले और संभावित कानूनी लड़ाई पर टिकी हुई है।
