मार्को रुबियो’ भारत में क्या वह अमरीका-भारत संबंधों को बचा सकते हैं?

सीमा सिरोही…..

मार्को रुबियो अपनी पहली भारत यात्रा पर एक भारी बोझ लेकर पहुंचे हैं। सोशल मीडिया के सतही संदेशों को अलग रखें, तो रुबियो का काम कठिन है-अपने समकक्षों को कैसे शांत किया जाए, संशयवादियों को कैसे आश्वस्त किया जाए और यह ढोंग कैसे किया जाए कि पिछले डेढ़ साल की घटनाएं संबंधों में एक मामूली भटकाव के अलावा और कुछ नहीं थीं। यह आसान नहीं है। लेकिन ट्रम्प के मंत्रिमंडल के सबसे कुशल सदस्य के रूप में, जो जरूरत पडने पर कूटनीति का उपयोग कर सकते हैं और आवश्यकता होने पर आग उगल सकते हैं, विदेश मंत्री और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार शायद इस समय के लिए सबसे आवश्यक व्यक्ति हैं।

निश्चित रूप से, उन्हें एक कठिन जूरी का सामना करना पड़ेगा। लेकिन हाल ही में भारत में हुई ब्रिक्स बैठक के बारे में रुबियो के पास खुद भी कुछ सवाल हो सकते हैं। ट्रम्प का मानना है कि यह समूह अमरीकी हितों के प्रतिकूल है। 23-26 मई की इस यात्रा में दिल्ली के अलावा कोलकाता, आगरा और जयपुर के पड़ाव शामिल हैं, जिसमें अमरीका की 250वीं वर्षगांठ मनाने के उत्सव भी शामिल हैं। रुबियो का ‘गोल्डन ट्रायंगल’ (स्वर्ण त्रिभुज) का यात्रा कार्यक्रम दिलचस्प है। आधिकारिक एजैंडे में ऊर्जा, व्यापार और रक्षा सहयोग पर बातचीत शामिल है, जिसमें अमरीकी तेल, हथियार और छोटे परमाणु रिएक्टर ‘अधिक खरीदने’ का अंर्तनहित संदेश है। अंतिम दिन ऑस्ट्रेलिया और जापान की उपस्थिति में एक क्वाड विदेश मंत्रियों की बैठक की योजना है।

लगातार दूसरे वर्ष राष्ट्राध्यक्षों के शिखर सम्मेलन की संभावना कम ही दिख रही है। जब से ट्रम्प ने पद संभाला है, उन्होंने ‘क्वाड’ शब्द का उच्चारण तक नहीं किया। क्या यह चीन को खुश करने के लिए है या इसलिए कि वह इस समूह का कोई मूल्य नहीं देखते हैं, यह स्पष्ट नहीं है। यह गिरावट कुछ वैसी ही है, जैसे ‘विश्वगुरु’ सिकुड़कर ‘विश्वमित्र’ रह जाए। क्वाड को एक तरफ रखें, तो भारत-अमरीका द्विपक्षीय संबंधों को राजनीतिक जड़ता से बाहर निकालने की आवश्यकता अधिक तात्कालिक है।

मौखिक अपमान और टैरिफ की चोट का वर्ष अभी भी यादों में ताजा है, ईरान पर अमरीकी युद्ध भारत को कई तरीकों से नुकसान पहुंचा रहा है, जिनकी गिनती करना मुश्किल है और शी जिनपिंग और आसिम मुनीर के प्रति ट्रम्प का झुकाव हर चीज को और कठिन बना देता है। क्या ट्रम्प के ये व्यवधान इसके लायक हैं? वे देश जो महासागरों की सुरक्षा से नहीं घिरे हैं या तेल से समृद्ध नहीं हैं या ट्रिलियन-डॉलर के सैन्य बजट द्वारा सुरक्षित नहीं हैं, वे कहेंगे, ‘बिल्कुल नहीं।’ रुबियो निरूसंदेह कुछ वास्तविक और कुछ काल्पनिक तर्क देंगे, ताकि दोनों पक्ष शांत रहकर अपना काम जारी रख सकें।

क्या उनकी स्वागत समिति इससे सहमत होती है, यह अलग बात है। रुबियो को पाकिस्तान की ओर अमरीकी झुकाव पर दिल्ली का नजरिया मिलेगा और यह भी कि इससे भारत के खिलाफ पाकिस्तान प्रायोजित एक और आतंकवादी हमले का खतरा कैसे बढ़ जाता है। ट्रम्प से कथित निकटता मुनीर को इस विश्वास में एक और दुस्साहस के लिए उत्तेजित कर सकती है कि उन्हें राष्ट्रपति के ‘पसंदीदा’ फील्ड मार्शल के रूप में संरक्षण प्राप्त है। जैसा कि एक पूर्व राजदूत ने उल्लेख किया, मुनीर को व्हाइट हाऊस के दोपहर के भोजन पर आमंत्रित करना इसराईल के खिलाफ 7 अक्तूबर के हमलों के बाद हमास के प्रमुख को बुलाने जैसा था।

रुबियो के लिए विचार करने योग्य एक बात यहां है-ओ.आर.एफ. के युवाओं के एक नए सर्वेक्षण से पता चलता है कि अमरीका के लिए समर्थन घट रहा है। यह 2024 के 83 प्रतिशत से गिरकर 2025 में 56 प्रतिशत रह गया। कम से कम 71 प्रतिशत उत्तरदाता अमरीका की अप्रत्याशितता को लेकर चिंतित थे और उन्होंने रूस और जापान को अगले 10 वर्षों में अग्रणी भागीदार बनते देखा। यदि यह भी अमरीकी विदेश मंत्रालय को सचेत नहीं करता है, तो कुछ भी नहीं करेगा। लेकिन फिर, अमरीकी राजनयिकों ने अधिकांश ‘आम’ भारतीयों के अमरीका-समर्थक झुकाव की कभी वास्तव में सराहना नहीं की, न ही इसे पोषित की जाने वाली एक रणनीतिक संपत्ति के रूप में माना है।

वे इसकी बजाय पाकिस्तान में अमरीकी दूतावास और वाणिज्य दूतावासों पर हमला करने वाली आक्रोशित भीड़ को रिझाने में ऊर्जा लगाना पसंद करेंगे, जो लगभग हमेशा पाकिस्तान सेना के इशारे पर होता है। भारत के पास बदलते समीकरणों, विशेष रूप से अमरीका और चीन के बीच के समीकरणों से निपटने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। रुबियो निरूसंदेह हाल के अमरीका-चीन शिखर सम्मेलन पर अपने विचार सांझा करेंगे और यह भी कि क्यों प्रतिस्पर्धा का यह बड़ा खेल शी जिनपिंग को सोयाबीन और बोइंग बेचने में खो गया।

भारत के लिए बिक्री पिच में परमाणु ऊर्जा पर जोर शामिल होगा, एक ऐसा क्षेत्र, जहां चीजें आखिरकार आगे बढ़ती दिख रही हैं। अमरीकी उद्योग के अधिकारियों और भारत के ऊर्जा मंत्री ने हाल ही में बैठक की कि कैसे 2047 तक 100 गीगावाट परमाणु क्षमता का भारत का दृष्टिकोण वास्तविकता बन सकता है। महाराष्ट्र छोटे मॉड्यूलर रिएक्टरों के लिए एक ‘शुरुआती केंद्र’ के रूप में उभर सकता है। नकारात्मक पक्ष यह है कि अमरीका-भारत द्विपक्षीय व्यापार समझौते पर अभी तक हस्ताक्षर नहीं हुए।

क्या अमरीका में 30 बिलियन डॉलर तक निवेश करने का गौतम अडानी का कदम रास्ता आसान करेगा? या इस ठप्प पड़े सौदे पर अमरीका की उच्च टैरिफ की धमकियां मंडराती रहेंगी? सहमत हुई शुरुआती शर्तेंध्दरें अब मान्य नहीं हैं क्योंकि अमरीकी सुप्रीम कोर्ट ने उन टैरिफ को अमान्य कर दिया, जो ट्रम्प ने आपातकालीन शक्तियों का उपयोग करके लगाए थे। इससे पहले सघ्जयो गोर की रुबियो की यात्रा की घोषणा करने वाली पोस्ट पर एच-1बी, कॉल सैंटर स्कैमर्स और अवैध भारतीय प्रवासियों के खिलाफ कई गुस्से वाली टिप्पणियां आईं।

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