होर्मुज स्ट्रेट मिशन पर अमेरिका को झटका, सऊदी अरब ने एयरस्पेस देने से किया इनकार

दुबई। होर्मुज स्ट्रेट में जहाजों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करने के लिए अमेरिका द्वारा शुरू किया गया ‘प्रोजेक्ट फ्रीडम’ अब अंतरराष्ट्रीय कूटनीति और पश्चिम एशिया की राजनीति का बड़ा मुद्दा बन गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा शुरू किया गया यह मिशन महज एक दिन के भीतर रोक दिया गया, जिसके पीछे अब सऊदी अरब की भूमिका को अहम माना जा रहा है।

अमेरिकी मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, मिशन को रोकने की सबसे बड़ी वजह सऊदी अरब द्वारा सहयोग से इनकार करना था। बताया जा रहा है कि रियाद ने अमेरिकी सैन्य विमानों को अपने एयरस्पेस और एयरबेस इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं दी, जिससे पूरे अभियान की रणनीति प्रभावित हो गई।

एनबीसी न्यूज की रिपोर्ट में अमेरिकी अधिकारियों के हवाले से कहा गया कि ट्रम्प ने बिना व्यापक कूटनीतिक तैयारी के अचानक सोशल मीडिया पर ‘प्रोजेक्ट फ्रीडम’ की घोषणा कर दी थी। इससे खाड़ी क्षेत्र के सहयोगी देशों में असहजता पैदा हो गई। रिपोर्ट के मुताबिक, सऊदी अरब समेत कई देशों को इस मिशन की पूरी जानकारी पहले से नहीं दी गई थी।

ट्रम्प की सार्वजनिक घोषणा के बाद खाड़ी देशों ने इस अभियान को लेकर चिंता जताई। खासतौर पर सऊदी अरब ने इसे पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ाने वाला कदम माना। बाद में ट्रम्प ने सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान से बातचीत भी की और अमेरिकी विमानों को एयरस्पेस तथा सैन्य ठिकानों के उपयोग की अनुमति देने का आग्रह किया, लेकिन सऊदी नेतृत्व ने इस पर सहमति नहीं दी।

विश्लेषकों के अनुसार, सऊदी अरब ईरान के साथ किसी प्रत्यक्ष टकराव की स्थिति से बचना चाहता था। पश्चिम एशिया में पहले से जारी तनाव और तेल आपूर्ति की संवेदनशीलता को देखते हुए रियाद ने बेहद सतर्क रुख अपनाया।

अमेरिकी अधिकारियों के मुताबिक, मिशन के शुरुआती दो दिनों में अमेरिका केवल तीन जहाजों को ही होर्मुज स्ट्रेट से सुरक्षित निकाल पाया। सैन्य और लॉजिस्टिक सहयोग की कमी के कारण ऑपरेशन अपेक्षित स्तर पर आगे नहीं बढ़ सका।

गौरतलब है कि होर्मुज स्ट्रेट दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में से एक है। वैश्विक तेल आपूर्ति का बड़ा हिस्सा इसी मार्ग से गुजरता है। ऐसे में यहां किसी भी सैन्य तनाव का असर अंतरराष्ट्रीय बाजारों और ऊर्जा सुरक्षा पर सीधा पड़ता है।

जब अमेरिका को यह महसूस हुआ कि क्षेत्रीय सहयोग के बिना मिशन को लंबे समय तक जारी रखना मुश्किल होगा, तब ट्रम्प प्रशासन ने इसे रोकने का फैसला लिया। हालांकि मिशन रोकने की घोषणा करते समय ट्रम्प ने दावा किया था कि यह फैसला पाकिस्तान के अनुरोध पर लिया गया है। लेकिन बाद में सामने आई रिपोर्ट्स ने इस दावे पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका अपने खाड़ी सहयोगी देशों के साथ मतभेदों को सार्वजनिक नहीं करना चाहता था, इसलिए पाकिस्तान का नाम सामने लाया गया। उनका कहना है कि पश्चिम एशिया के देश अब किसी भी बड़े सैन्य अभियान में खुलकर शामिल होने से बच रहे हैं, क्योंकि इसका सीधा असर उनकी अर्थव्यवस्था और तेल व्यापार पर पड़ सकता है।

मिशन रोकने के बावजूद ट्रम्प ने ईरान के खिलाफ सख्त रुख जारी रखा। उन्होंने दावा किया कि हालिया अमेरिकी कार्रवाई में ईरान की नौसेना, वायुसेना, मिसाइल प्रणाली और रडार नेटवर्क को भारी नुकसान पहुंचाया गया है। साथ ही चेतावनी दी कि यदि हालात नहीं सुधरे तो अमेरिका और बड़े सैन्य कदम उठा सकता है।

विश्लेषकों के अनुसार, इस पूरे घटनाक्रम ने यह स्पष्ट कर दिया है कि पश्चिम एशिया में केवल सैन्य ताकत के भरोसे बड़े अभियान सफल नहीं हो सकते। क्षेत्रीय समर्थन और कूटनीतिक सहमति किसी भी रणनीतिक अभियान की सफलता के लिए उतनी ही जरूरी है।

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