सारनाथ का इतिहास सबसे पहले बाबू जगत सिंह द्वारा कराई गई खुदाई के बाद सामने आया था : एएसआई

एएसआई ने इतिहास का पुनर्लेखन किया: सारनाथ की खोज का श्रेय बाबू जगत सिंह को दिया गया

वाराणसी, 14 मार्च (RNN)। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) ने स्वीकार किया है कि सारनाथ के ऐतिहासिक महत्व का पता सबसे पहले बाबू जगत सिंह द्वारा कराई गई खुदाई के बाद चला था। अधिकारियों ने शनिवार को यह जानकारी दी।

एएसआई के महानिदेशक वाई. एस. रावत ने बताया कि सारनाथ में सबसे पहले खुदाई का काम बाबू जगत सिंह ने कराया था, जिसके कारण इस स्थल के ऐतिहासिक महत्व का पता चला।

रावत ने बताया कि बाबू जगत सिंह के वंशज प्रदीप नारायण सिंह ने एएसआई को कई ऐतिहासिक दस्तावेज सौंपे हैं, जिनसे यह साबित होता है कि इस स्थल पर पहली खुदाई बाबू जगत सिंह ने ही कराई थी।

वाराणसी से लगभग 10 किलोमीटर दूर स्थित सारनाथ दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण बौद्ध तीर्थ स्थलों में से एक है। माना जाता है कि यही वह स्थान है जहां गौतम बुद्ध ने ज्ञान प्राप्ति के बाद अपना पहला उपदेश दिया था, जिससे बौद्ध धर्म के प्रसार की शुरुआत हुई।

प्रदीप नारायण सिंह ने बताया कि सारनाथ का इलाका कभी उनके परिवार की जमींदारी के अंतर्गत आता था और ऐतिहासिक अभिलेखों से पता चलता है कि बाबू जगत सिंह ने वर्ष 1787-88 में वहां खुदाई का कार्य कराया था।

उन्होंने कहा, “बाबू जगत सिंह ने उस क्षेत्र में कुछ खुदाई कराई थी, जिसके परिणामस्वरूप अंततः इस स्थल की खोज हुई।”

एएसआई महानिदेशक वाई. एस. रावत ने बताया कि सारनाथ परिसर में लगी पट्टिका (शिलालेख) में अब संशोधन कर दिया गया है और उसमें बाबू जगत सिंह की भूमिका को मान्यता देते हुए उनका नाम भी शामिल कर लिया गया है।

हाल ही में लगाई गई नई पट्टिका में यह उल्लेख किया गया है कि इस स्थल का महत्व 18वीं सदी के अंत में तब सामने आया, जब काशी के बाबू जगत सिंह ने निर्माण सामग्री के लिए एक प्राचीन टीले की खुदाई कराई थी, जिससे कई महत्वपूर्ण पुरावशेषों की खोज हुई।

पहले लगी पट्टिका में इस स्थल के पुरातात्विक महत्व की खोज का श्रेय वर्ष 1798 में ब्रिटिश अधिकारियों को दिया गया था। संशोधित शिलालेख में अब यह स्वीकार किया गया है कि शुरुआती खुदाई में बाबू जगत सिंह की महत्वपूर्ण भूमिका थी।

शिलालेख में यह भी उल्लेख है कि बाद में कई पुरातत्वविदों ने यहां खुदाई का कार्य किया, जिसमें तीसरी सदी ईसा पूर्व से लेकर 12वीं सदी ईस्वी तक के मठ, स्तूप, मंदिर और मूर्तियां मिलीं।

वाराणसी के जगतगंज शाही परिवार के प्रतिनिधि और बाबू जगत सिंह की छठी पीढ़ी के वंशज प्रदीप नारायण सिंह ने कहा कि उनके पूर्वज के ऐतिहासिक योगदान को प्रमाणित करने के लिए लंबे समय से शोध और दस्तावेज एकत्र किए जा रहे थे।

उन्होंने कहा कि अब एएसआई ने औपचारिक रूप से स्वीकार कर लिया है कि सारनाथ का इतिहास सबसे पहले बाबू जगत सिंह द्वारा कराई गई खुदाई के बाद ही सामने आया था।

प्रदीप नारायण सिंह के अनुसार लंबे समय तक यह माना जाता रहा कि सारनाथ और उसके प्राचीन अवशेषों की खोज अंग्रेजों ने की थी, लेकिन एएसआई की इस मान्यता से स्पष्ट हो गया है कि बाबू जगत सिंह ने उनसे पहले ही यह कार्य कर लिया था। उन्होंने कहा कि ब्रिटिश काल में बाबू जगत सिंह के योगदान को नजरअंदाज कर दिया गया था और उन्हें सारनाथ की खोज का उचित श्रेय नहीं मिल सका।

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