लखनऊ, 13 मार्च (RNN)। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने शुक्रवार को दावा किया कि अगर भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू जीवित होते तो कांशीराम कांग्रेस की ओर से उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री होते। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि अगर कांग्रेस ने अपना काम सही ढंग से किया होता तो कांशीराम की राजनीतिक सफलता संभव नहीं होती।
कांशीराम की जयंती (15 मार्च) से दो दिन पहले लखनऊ के इंदिरा गांधी प्रतिष्ठान में आयोजित संविधान सम्मेलन को संबोधित करते हुए राहुल गांधी ने भीमराव आंबेडकर और कांशीराम के योगदान की सराहना की।
उन्होंने कहा, “कांशीराम जी समाज में बराबरी की बात करते थे। कांग्रेस अपना काम पूरी तरह से नहीं कर सकी, यही कारण है कि कांशीराम जी सफल हुए। अगर कांग्रेस ठीक तरह से काम करती तो कांशीराम जी कभी सफल नहीं होते।”
राहुल गांधी ने कहा, “अगर जवाहरलाल नेहरू जी जिंदा रहते तो कांशीराम जी कांग्रेस के मुख्यमंत्री होते।”
कांग्रेस सांसद ने आरोप लगाया कि भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने देश की 85 प्रतिशत आबादी की अनदेखी की है। उन्होंने कहा कि संविधान के अनुसार देश सबका है और सभी लोग समान हैं, लेकिन आज समाज को 15 और 85 प्रतिशत में बांट दिया गया है, जिसका लाभ केवल 15 प्रतिशत लोगों को मिल रहा है।
उन्होंने कहा कि महात्मा गांधी, भीमराव आंबेडकर और कांशीराम के विचार त्याग और संघर्ष पर आधारित थे। राहुल गांधी ने कहा कि गांधी 10–15 साल जेल में रहे लेकिन उन्होंने समझौता नहीं किया, बाबासाहेब आंबेडकर ने भी अपना पूरा जीवन समाज के लिए समर्पित किया और कांशीराम ने भी अपने सिद्धांतों से कभी समझौता नहीं किया।
राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में पिछड़े, अति पिछड़े, दलित और आदिवासी समाज की पर्याप्त भागीदारी नहीं है। उन्होंने कहा कि भारत का संविधान नाथूराम गोडसे या विनायक दामोदर सावरकर के विचारों पर नहीं, बल्कि महात्मा गांधी, भीमराव आंबेडकर और कांशीराम जैसे नेताओं की सोच पर आधारित है।
राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वह संविधान की भावना को नहीं मानते और देश की ऊर्जा सुरक्षा से समझौता किया है।
उन्होंने संसद में दिए अपने हालिया भाषण का उल्लेख करते हुए कहा कि देश में एलपीजी सिलेंडर की उपलब्धता का मुद्दा गंभीर है और अगर भारत को अमेरिका के कहने पर रूस, ईरान या इराक से तेल और गैस खरीदने के फैसले लेने पड़ते हैं तो इससे देश की ऊर्जा सुरक्षा पर असर पड़ सकता है।
