शाहजहांपुर स्थित मुमुक्षु आश्रम परिसर में चल रही श्रीरामकथा के तीसरे दिन श्रद्धा, भक्ति और आध्यात्मिक भावनाओं का अद्भुत संगम देखने को मिला। कथा व्यास विजय कौशल जी महाराज ने ‘नरसी का भात’ प्रसंग का इतना मार्मिक और भावपूर्ण वर्णन किया कि पूरा पांडाल भक्तिरस में डूब गया और अनेक श्रद्धालुओं की आंखें नम हो उठीं।
कथाव्यास ने बताया कि महान भक्त नरसी मेहता अत्यंत निर्धन होने के बावजूद अपने आराध्य श्रीकृष्ण पर अटूट विश्वास रखते थे। जब उनकी पुत्री के मायरे का समय आया और समाज ने उनकी गरीबी का उपहास उड़ाया, तब उन्होंने पूर्ण श्रद्धा से प्रभु का स्मरण किया। भक्त की सच्ची भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान स्वयं सेठ के रूप में प्रकट हुए और भक्त की लाज रखी। इस प्रसंग ने उपस्थित श्रद्धालुओं के हृदय में भक्ति और विश्वास की गहरी छाप छोड़ी।
कथा के अगले चरण में देवर्षि नारद के अहंकार और भगवान विष्णु द्वारा उसे दूर करने की प्रेरणादायक कथा सुनाई गई। कथाव्यास ने कहा कि भक्ति का मूल आधार विनम्रता है, क्योंकि अहंकार साधना के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा बनता है। उन्होंने समझाया कि सच्ची भक्ति में समर्पण, सेवा और सरलता का भाव होना आवश्यक है।

कार्यक्रम के समापन अवसर पर “बाबा भोलेनाथ मेरी नैया तो उबारो…” भजन की गूंज से पूरा वातावरण शिवमय हो उठा। श्रद्धालु भक्ति में झूम उठे और आश्रम परिसर “हर-हर महादेव” के जयकारों से गुंजायमान हो गया। इसके पश्चात प्रभु श्रीराम की आरती संपन्न हुई तथा उपस्थित श्रद्धालुओं को प्रसाद वितरित किया गया।
तीसरे दिन के मुख्य यजमान डॉ. के.के. शुक्ला एवं श्रीमती मधुरानी शुक्ला रहे। आयोजन में स्वामी चिन्मयानंद सरस्वती सहित अनेक संत-महात्मा, गणमान्य नागरिक और बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं की गरिमामयी उपस्थिति रही।
पूरे आयोजन में अनुशासन, भक्ति और आध्यात्मिक ऊर्जा का अद्वितीय वातावरण देखने को मिला। श्रीरामकथा के माध्यम से श्रद्धालुओं को भक्ति, विश्वास और विनम्रता का संदेश मिला, जिसने उपस्थित जनसमूह के मन में आध्यात्मिक चेतना का नया संचार किया। मुमुक्षु आश्रम में चल रही यह कथा न केवल धार्मिक आयोजन, बल्कि आत्मिक जागरण का प्रेरक माध्यम बनकर उभरी।
