नई दिल्ली। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) ने अपनी स्थापना के 100 वर्ष पूरे कर लिए हैं। 1925 में नागपुर में शुरू हुआ यह संगठन आज हिंदू राष्ट्रवाद की सबसे प्रमुख विचारधारा बन चुका है और भारतीय राजनीति, विशेष रूप से भाजपा, को वैचारिक दिशा देने वाली ताकत के रूप में उभरा है। शिक्षा, सामाजिक सेवा और राष्ट्र निर्माण में सक्रिय भूमिका निभाने वाले इस संगठन का नेतृत्व अब तक केवल छह व्यक्तियों ने संभाला है, जिन्हें “सरसंघचालक” कहा जाता है।
RSS प्रमुख मोहन भागवत ने हाल ही में कहा कि “हिंदुस्तान का हिंदू राष्ट्र होना संघ का स्थिर मत है,” लेकिन इसके साथ ही उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि संघ अन्य विषयों पर अपने विचारों में बदलाव को लेकर हमेशा तैयार है। इस विचारशीलता और निरंतरता का ही परिणाम है कि यह संगठन एक छोटे से विचार मंच से निकलकर आज एक राष्ट्रीय शक्ति बन चुका है।
आइए जानते हैं उन छह सरसंघचालकों के बारे में जिन्होंने बीते 100 वर्षों में RSS को आकार दिया:
1. डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार (1925-1940)
संघ के संस्थापक और पहले सरसंघचालक
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पेशे से डॉक्टर, “डॉक्टरजी” के नाम से प्रसिद्ध।
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27 सितंबर, 1925 को नागपुर में संघ की स्थापना की।
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पहले भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में सक्रिय थे और असहयोग आंदोलन में भाग लेने के कारण जेल भी गए।
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उनका उद्देश्य था – एक संगठित, सशक्त और संस्कारित हिंदू समाज की स्थापना।
2. माधव सदाशिव गोलवलकर (1940-1973)
संघ को वैचारिक विस्तार देने वाले नेता
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“गुरुजी” के नाम से प्रसिद्ध।
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उनके कार्यकाल में संघ की गतिविधियाँ पूरे देश में फैलीं।
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1948 में गांधीजी की हत्या के बाद संघ पर लगे प्रतिबंध के समय वे सरसंघचालक थे।
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उन्होंने “बंच ऑफ थॉट्स” जैसी पुस्तकों के माध्यम से संघ के विचारों को स्पष्ट किया।
3. मधुकर दत्तात्रेय देवरस (1973-1994)
आपातकाल के दौरान सक्रिय नेतृत्व
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12 साल की उम्र से संघ से जुड़े।
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जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में चले आंदोलन में संघ की भूमिका को सार्वजनिक रूप से जोड़ा।
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आपातकाल के खिलाफ संघर्ष में उन्होंने संघ को सक्रिय भागीदारी दी।
4. राजेंद्र सिंह ‘रज्जू भैया’ (1994-2000)
संघ के पहले गैर-ब्राह्मण प्रमुख
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इलाहाबाद विश्वविद्यालय के भौतिकी के प्रोफेसर रहे।
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सादा जीवन, स्पष्ट विचार और सौम्य व्यवहार के लिए प्रसिद्ध।
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वैचारिक संवाद को महत्व देने वाले सरसंघचालक।
5. के. एस. सुदर्शन (2000-2009)
तकनीकी दृष्टिकोण और संगठन विस्तार पर जोर
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कर्नाटक के निवासी।
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उनके कार्यकाल में स्वदेशी विचारधारा को मजबूती मिली।
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खराब स्वास्थ्य के चलते 2009 में पद से हटे।
=6. मोहन भागवत (2009-वर्तमान)
आधुनिक संदर्भों में संघ की भूमिका को परिभाषित करने वाले
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महाराष्ट्र के अकोला से हैं।
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पशु चिकित्सा में स्नातक, लेकिन प्रचारक बनने के लिए पढ़ाई बीच में छोड़ दी।
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उनके नेतृत्व में संघ ने अपने विचारों को लेकर ज्यादा संवाद और लचीलापन दिखाया।
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पिछले वर्षों में उन्होंने कहा, “हिंदुत्व का अर्थ भारतीयता है,” और संघ को एक “लचीला और संवादशील संगठन” बताया।
संघ और भाजपा के बीच संबंध
हाल ही में भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा ने कहा था कि पार्टी अब उस दौर से आगे निकल चुकी है जब उसे हर कदम पर संघ की जरूरत होती थी। इस पर मोहन भागवत ने संयमित प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि “जनता की सेवा करने वालों में अहंकार नहीं होना चाहिए।”
यह बयान दर्शाता है कि संघ आज भी विचारधारा और संतुलन की भूमिका में खुद को देखता है।
