क्या मनरेगा के बाद आरटीआई को खत्म करना चाहती है सरकार?: खरगे

नयी दिल्ली, 30 जनवरी – कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने शुक्रवार को आर्थिक समीक्षा में सूचना का अधिकार (आरटीआई) अधिनियम की पुनः समीक्षा की सिफारिश का हवाला देते हुए सवाल किया कि क्या सरकार मनरेगा के बाद अब आरटीआई कानून को भी समाप्त करना चाहती है।

संसद में बृहस्पतिवार को पेश वर्ष 2025-26 की आर्थिक समीक्षा में लगभग दो दशक पुराने आरटीआई अधिनियम, 2005 का फिर से अध्ययन करने की पैरवी की गई है। समीक्षा में कहा गया है कि गोपनीय रिपोर्टों और मसौदों को सार्वजनिक किए जाने से छूट दिए जाने की जरूरत पर विचार किया जाना चाहिए।

आर्थिक समीक्षा में यह भी उल्लेख किया गया है कि आरटीआई कानून का उद्देश्य इसे ‘‘व्यर्थ की जिज्ञासा’’ का माध्यम बनाना नहीं था और न ही इसका मकसद बाहर से बैठकर सरकार के हर छोटे-छोटे काम में हस्तक्षेप या उसे नियंत्रित करना था।

खरगे ने सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर पोस्ट करते हुए कहा, “आर्थिक समीक्षा ने सूचना का अधिकार अधिनियम की फिर से अध्ययन करने की वकालत की है। इसमें सूचना को रोकने के लिए संभावित ‘मंत्री-स्तरीय वीटो’ का सुझाव भी दिया गया है और यह विचार किया गया है कि क्या नौकरशाहों की सार्वजनिक सेवा से जुड़े रिकॉर्ड, तबादले और स्टाफ रिपोर्ट्स को सार्वजनिक निगरानी से बाहर रखा जा सकता है।”

उन्होंने आरोप लगाया कि मोदी सरकार ने ‘‘व्यवस्थित रूप से आरटीआई अधिनियम को कमजोर किया है’’। खरगे के अनुसार, वर्ष 2025 तक 26,000 से अधिक आरटीआई से जुड़े मामले लंबित हैं। उन्होंने यह भी कहा कि 2019 में सरकार ने आरटीआई अधिनियम में संशोधन कर सूचना आयुक्तों के कार्यकाल और वेतन को अपने नियंत्रण में ले लिया, जिससे स्वतंत्र निगरानी संस्थाएं ‘‘आज्ञाकारी अधिकारियों’’ में बदल गईं।

कांग्रेस अध्यक्ष ने डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 का हवाला देते हुए आरोप लगाया कि इसकी आड़ में ‘‘जनहित’’ से जुड़े प्रावधानों को कमजोर किया गया और निजता को हथियार बनाकर भ्रष्टाचार को ढकने तथा जांच-पड़ताल रोकने का रास्ता खोला गया।

उन्होंने दावा किया कि दिसंबर 2025 तक केंद्रीय सूचना आयोग बिना मुख्य सूचना आयुक्त के काम करता रहा और पिछले 11 वर्षों में सातवीं बार इस महत्वपूर्ण पद को लंबे समय तक खाली रखा गया। खरगे ने यह भी आरोप लगाया कि 2014 से अब तक 100 से अधिक आरटीआई कार्यकर्ताओं की हत्या हो चुकी है, जिससे सच सामने लाने वालों को डराने और असहमति की आवाज दबाने का माहौल बना है।

खरगे ने सवाल किया, “मनरेगा को खत्म करने के बाद, क्या अब आरटीआई की बारी है?”

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